नजफ की एक तंग गली में, किराए के मकान में रहता है, दुनिया भर के आयतुल्लाह का सिरमौर

ज़ैग़म मुर्तज़ा

समाचार ऐजेंसी रायटर्स के हवाले से दुनिया भर के तमाम अख़बारों ने पोप फ्रांसिस की आयतुल्लाह उज़्ज़मां सैयद अली सीस्तानी से मुलाक़ात की ख़बर छापी। इस ख़बर में दो लाइन काफी अहम थीं। एक, आयतुल्लाह पोप से मिलने के लिए अपने स्थान से खड़े हुए जो एक दुर्लभ घटना है। दूसरा, दुनिया भर में जितने आयतुल्लाह हैं, उनका सिरमौर नजफ की एक तंग गली में, किराए के मकान में रहता है। यह वह शख़्स है जिसकी एक आवाज़ पर लब्बैक कहते हुए दुनिया भर से लाखों लोग अपनी जान देने घर से निकल सकते हैं। जितने पैसे का प्रबंध और वितरण इनका दफ्तर करता है उतनी कई देशों की अर्थव्वस्था नहीं है। दुनिया में जितने स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, यतीमख़ानों को इनका दफ्तर वित्त पोषित करता है, उतने शायद बड़े-बड़े देशों की सरकार नहीं करतीं।

इतना सादा जीवन जीने वाले आयतुल्लाह उज़्ज़मां सैयद अली सीस्तानी अकेले नहीं हैं। ईरान के सर्वोच्च नेता सैयद अली ख़ामेनेई का ढाई कमरे का मकान लोगों के लिए सबक़ है। ईरानी क्रांति के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह सैयद रूहल्लाह मूसवी ख़ुमैनी ने तेहरान के जमकरान मुहल्ले के एक कमरे के मकान में उम्र गुज़ार दी। यह मकान उनके दोस्त का था। ख़ुमैन के जिस घर में उनका जन्म हुआ वह आज भी कड़ियों की छत वाला पुराना ढांचा है। नजफ, कर्बला, क़ुम, मशहद जैसे शहरों में दर्जनों बड़े मौलवी और आयतुल्लाह गुमनाम से अपने-अपने काम में लगे हैं। उनकी न तस्वीरें छपती हैं और न नेताओं से मुलाक़ात की ख़बरें। ग़ौरतलब है कि हर मौलवी आयतुल्लाह नहीं हो सकता। कोई फर्ज़ी तरीक़े से अपने नाम में जोड़ ले तो बात अलग है।

भारतीय धर्मगुरुओं के ठाठ

अब ज़रा घर वापस लौटिए। भारत जैसे विशाल देश में कोई आयतुल्लाह नहीं है। आख़िरी बार यहां कौन हुआ था, किसी को याद नहीं है। इतने पर भी यहां के मौलवियों के ढंग देखिए। भारत और पाकिस्तान के अधिकतर मौलवी (इनमें कई सुन्नी भी शामिल हैं) सीस्तानी या ख़ामेनेई साहब के दफ्तर से वज़ीफा या आर्थिक मदद पाते हैं। इनमें कई मौलवी मदरसे, स्कूल, कालेज और मेडिकल कालेज के नाम पर पैसे उठा लाते हैं। यतीम, बेवाओं के नाम की ग्रांट उठाते है। और फिर इनके रंग-ढंग देखिए। इनके घर, गाड़ी, रहन-सहन, पहनावे और दिखावे की तुलना किसी आयतुल्लाह से कीजिए। उनको देखिए जो किसी से मिलने अपने घर के दरवाज़े तक नहीं जाते लेकिन उनके दरवाज़े आम लोगों के लिए चौबीस घंटे खुले रहते हैं। कोई भी आदमी किसी वक़्त उनके घर या दफ्तर में दाख़िल हो सकता है और अगर वह पहले से किसी काम में व्यस्त नहीं हैं तो मिल भी सकता है। इधर अपने वालों के दरवाज़े की घंटी बजाते हुए लोग घबराते हैं।

आम आदमी के सामने अकड़े-अकड़े फिरने वाले मौलाना साहब अफसरों और अधपढ़ नेताओ के सामने बिछे-बिछे नज़र आते हैं। वक़्फ, ज़कात, ख़ुम्स, यतीमों, बेवाओं का हक़ निगलना मौलवी साहब अपना दीनी फरीज़ा समझते हैं। इसके बाद कहते हैं कि क़ौम हमारे साथ इंसाफ नहीं करती। मौलवी साहब यह नहीं समझ पा रहे हैं कि इज़्ज़त फाॅर्च्यूनर, मर्सिडीज़, बीएमडब्लू में बैठ कर नहीं मिलती। उल्टे, अगर बीएमडब्लू या फाॅर्च्यूनर किसी दलाल या उचक्के की है तो बची इज़्ज़त भी ख़त्म हो जाती है।  आयतुल्लाह सीस्तानी के पास निजी हवेली, क़िला, कार या जहाज़ नहीं है सिर्फ किरदार और ऐसा जीवन है जो दूसरों के लिए प्रेरणादायक है। अगर मौलवी साहेबान भी अपने आयतुल्लाह से सबक़ नहीं ले सकते तो बाक़ी अवाम ही क्या सीखेंगे? अवाम के सामने तो मौलवी और उसका जीवन है। आयतुल्लाह तो ख़बरों और सुर्ख़ियों से दूर किसी गुमनाम गली में क़ौम की ख़िदमत करते हुए जीवन गुज़ार रहे हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)