किताब समीक्षा : ‘दास्तान-ए-मुगल-ए-आजम’, एक शाहकार फिल्म के बनने की दास्तान

जाहिद खान

हिंदुस्तानी सिनेमा में फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’, संग-ए-मील की हैसियत रखती है। साल 1960 में आयी इस फिल्म का आज भी कोई जवाब नहीं। यह वाकई लाजवाब है ! फिल्म की रिलीज को साठ साल हो गए, लेकिन आज भी इसका खुमार चाहने वालों के दिल-ओ-दिमाग से नहीं उतरा है। ‘मुगल-ए-आजम’ में ऐसा क्या है ?, जो लोग आज भी इसके दीवाने हैं। वे कौन-कौन सी बातें हैं ?, जिसकी वजह से यह फिल्म आल टाइम हिट और इसे क्लासिक फिल्म का दर्जा हासिल हुआ। इन सब सवालों का जवाब ‘दास्तान-ए-मुगल-ए-आजम’ है। लेखक-पत्रकार राजकुमार केसवानी की इस नायाब किताब में न सिर्फ इन सवालों के तफसील से जवाब हैं, बल्कि इस बेमिसाल फिल्म के बनने से लेकर इसके रिलीज होने तक के दिलचस्प वाकियात और किस्से शामिल हैं। ‘मुगल-ए-आजम’ के बनने में नौ साल लगे। साल 1951 में शुरू हुई यह फिल्म, साल 1960 में जाकर मुकम्मल हुई। वहीं इस फिल्म के बनने की पूरी दास्तान लिखने में लेखक को पन्द्रह साल लगे। एक किताब को लिखने के लिए पन्द्रह साल का वक्त, एक लंबा अरसा होता है। लेकिन इस किताब को देखने और पढ़ने के बाद यह एहसास होता है कि लेखक ने किस तरह से एक-एक मोती चुनकर, एक खूबसूरत हार बुना है। ‘मुगल-ए-आजम’ हो या फिर ‘दास्तान-ए- मुगल-ए-आजम’, इस तरह की फिल्म और किताब हद दर्जे की दीवानगी और जुनून के बगैर नामुमकिन है। निर्देशक करीमउद्दीन आसिफ यानी के. आसिफ की दीवानगी और जुनून ही था कि तमाम आर्थिक परेशानियों और रुकावट के बाद भी यह फिल्म पूरी हुई और रिलीज होने के बाद इसने एक नया इतिहास बनाया।

अपने नाम के मुताबिक ही ‘दास्तान-ए-मुगल-ए-आजम’ किताब, पूरी फिल्म के बनने की खूबसूरत दास्तान है। इस दास्तान में ऐसी-ऐसी मालूमात और अनोखे वाकियात दर्ज हैं, जिन्हें जानकर पाठक हैरत में पड़ जाएंगे। मसलन ‘मुगल-ए-आजम’ के. आसिफ की दूसरी कोशिश थी। इससे पहले साल 1945 में भी उन्होंने चंद्र मोहन, सप्रू, वीना, दुर्गा खोटे और नरगिस को लेकर फिल्म बनाई थी, जो आधी बनने के बाद बंद हो गई। फिल्म में अनारकली के रोल के लिए निर्देशक ने उस वक्त के मशहूर हफ्तावार अखबार में बाकायदा एक इश्तिहार छपवाकर, हीरोइन की तलाश की थी। फिल्म की शूटिंग के दौरान पृथ्वीराज कपूर और मधुबाला दोनों ही गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे। यह बात अलग है कि फिल्म देखने पर जरा सा भी एहसास नहीं होता कि इन दोनों अदाकारों को किसी तरह की कोई तकलीफ है। फिल्म में शीश महल का सेट 110 माहिर कारीगरों की टीम ने 11 महीने रात-दिन काम कर बनाया था। फिल्म के वार सींस के लिए इंडियन आर्मी की जयपुर केवेलरी की पूरी एक बटालियन जिसमें 8 हजार जवान, 2 हजार ऊंट और 4 हजार घोड़ों का इस्तेमाल किया गया और यह सींस छह महीने में पूरे हुए थे। मुंबई के मराठा मंदिर सिनेमा हॉल में यह फिल्म 77 हफ्ते तक हाउसफुल चली थी। ‘अनारकली’ जिसके इर्द-गिर्द ‘मुगल-ए-आजम’ जैसी अजीमुश्शान फिल्म बनी, इस दिलचस्प किरदार पर ड्रामा निगार इम्तियाज अली ‘ताज’, शायर सागर निजामी, नॉवेल निगार अब्दुल हलीम शरर और गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर ने भी ड्रामे और कहानियां लिखी थीं। फिल्म के जानदार डायलॉग्स जो आज भी लोगों की जबान पर चढ़े हुए हैं, चार होनहार राइटरों अमान, अहसन रिजवी, कमाल अमरोही और वजाहत मिर्जा ने एक साथ मिलकर लिखे थे। फिल्म के निर्माता शापूरजी पालोनजी मिस्त्री एक कंस्ट्रक्शन कंपनी के मालिक थे और इस कंपनी ने मुम्बई में बॉम्बे सेंट्रल स्टेशन, क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल, नरीमन पाईंट, ओबेराय टावर जैसी आलीशान इमारतें बनाई थीं। रिलीज के 44 साल बाद, ब्लैक एंड व्हाइट ‘मुगल-ए-आजम’ को कलर में तब्दील करने में फिल्म निर्माता को क्या-क्या परेशानियां पेश आईं?

इन सब दिलचस्प जानकारियों के अलावा किताब में फिल्म, उससे जुड़े कलाकारों और फिल्म की पूरी टीम से मुताल्लिक ऐसे-ऐसे किस्से जमा हैं, जिन्हें पढ़कर पाठक दांतों तले अंगुली दबा लेंगे। किताब ‘मुगल-ए-आजम’ के साथ-साथ के. आसिफ की शख्सियत पर भी अच्छी तरह से रौशनी डालती है। किस तरह से उत्तर प्रदेश के छोटे से इलाके से आया नौजवान, देखते-देखते फिल्मी दुनिया का बेताज बादशाह बन गया ? फिल्म के जरिए के. आसिफ ने अकेले मुगल सम्राट अकबर की अजमत ही नहीं दिखलाई है, बल्कि मुल्क को कौमी यकजहती और भाईचारे का पैगाम दिया। फिल्म में मजहबी कट्टरता से इतर हिंदुस्तान की सतरंगी विरासत के सीन गढ़े। ‘मुगल-ए-आजम’ में ऐसे कई सीन हैं, जो आज किसी फिल्म में फिल्माए जाएं, तो विवाद पैदा हो जाए। फिरकापरस्त और तंगनजर लोग इन सीनों को लेकर सिनेमा हॉल में हंगामा बरपा दें। शंहशाह अकबर का अपनी राजपूत पत्नी जोधा बाई के साथ कृष्ण जन्माष्टमी मनाना और कृष्ण की मूर्ति को पालने में झुलाना, जंग के मैदान में जाने से पहले पंडित से माथे पर पूजा का टीका लगवाना, तो अनारकली का एक देवी मंदिर में नमाज अदा करना, फिल्म के कुछ ऐसे सीन हैं, जिन्हें धार्मिक कट्टरपंथी और ‘सांस्कृतिक’ राष्ट्रवादी शायद ही बर्दाश्त कर पाते।

अनेक ब्लैक एंड व्हाइट और रंगीन तस्वीरों से सजी 392 पेज की ‘दास्तान-ए-मुगल-ए-आजम’ की ताकत इसकी जबान और उतना ही उम्दा तरीके से इसे पेश करने का तरीका-सलीका है। आम-फहम जबान में लिखी इस किताब को जो भी पाठक एक बार पढ़ना पढ़ना शुरू करेगा, वह इसे खतम करके ही दम लेगा। किताब की एक और खासियत, या यूं कहें पाठकों के लिए एक बेहतरीन तोहफा मायानाज मुसव्विर एम. एफ. हुसैन की 25 बेशकीमती पेंटिंग्स हैं, जो उन्होंने ‘मुगल-ए-आजम’ से मुतासिर होकर बनाई थीं। उन्होंने फिल्म के चुनिंदा मंजरों को अपने खास अंदाज में केनवास पर उतारा था। कहा जा सकता है कि किताब को पढ़ने से जहां दिल-ओ-दिमाग को तसल्ली और लुत्फ आता है, तो वहीं इसे देखने से आंखों को सुकून और ठंडक मिलती है।

किताब में कुछ कमियां या खामियों की बात करें, तो ‘मुगल-ए-आजम’ की रिलीज के बाद देश-दुनिया में इस फिल्म को लेकर क्या माहौल, मेनिया और दीवानगी पैदा हुई ?, इसका भी तफ्सील से जिक्र होना सा। ‘मुगल-ए-आजम’ की प्लानिंग और तामीर पर लेखक ने खूब कसीदे काढ़े हैं, लेकिन फिल्म का भारतीय जनमानस पर क्या असर पड़ा ?, यहां उन्होंने कंजूसी बरती है। एक बात और, लेखक राजकुमार केसवानी बीते तेरह साल से लगातार एक दैनिक अखबार में हिंदी सिनेमा और उसके संगीत पर कॉलम लिख रहे हैं। इस कॉलम में वे पाठकों से बेतकल्लुफ होकर अपनी बात कहते हैं। कॉलम के जेरे असर किताब में भी वे कहीं-कहीं बेतकल्लुफ हो जाते हैं। लिहाजा किताब की शैली में जो तारतम्य होना चाहिए, वह टूट जाता है। किताब में के. आसिफ के ज़ाती मामलों का जिक्र भी जरूरी नहीं था। उन्होंने कितनी शादियां की और किसे छोड़ा ?, इन सब बातों का ‘दास्तान-ए-मुगल-ए-आजम’ से कोई तआल्लुक नहीं बैठता।

‘दास्तान-ए-मुगल-ए-आजम’ पूरी किताब ग्लेजड पेपर पर छपी है, लेकिन इसका साइज अजब बना है। इसकी मोटाई और साइज से यह मजहबी किताब की तरह दिखाई देती है। जिस तरह से किताब का प्रेजेंटेशन है, उसके हिसाब से यह किताब कॉफी टेबल बुक के तौर पर आती, तो इसका मजा और दोगुना होता। चूंकि किताब रंगीन और ग्लेजड पेपर पर छपी है, लिहाजा इसका दाम भी कुछ ज्यादा है। यदि हार्ड बाउंड के साथ-साथ पब्लिशर इस किताब को पेपर बैक में छापता, तो आम पाठक भी इस किताब को पढ़ने का लुत्फ ले पाते। एक किताब के लिए 1599 रूपए खर्च करना, आज भी आम हिंदुस्तानी के लिए चांद-तारे तोड़ लाने जैसा ही कारनामा है। बावजूद इसके ‘दास्तान-ए-मुगल-ए-आजम’ एक ऐसी शाहकार किताब बन पड़ी है, जिसे हिंदुस्तानी सिनेमा के शैदाई और कद्रदान, सिनेमा का अध्ययन करने वाले स्टूडेंट और फिल्मों से जुड़ा हर तबका अपनी लाईब्रेरी में जरूर रखना चाहेगा।

(लेखख महल कॉलोनी, शिवपुरी मध्यप्रदेश में रहते हैं उनसे मोबाईल  94254 89944 पर संपर्क किया जा सकता है।)