पूर्व IPS का लेखः आन्दोलनजीविता ज़िंदा रहने की पहली पहचान है, मुर्दे कभी आंदोलित हो ही नहीं सकते हैं।

विजय शंकर सिंह
विजय शंकर सिंह

आन्दोलनजीविता ज़िंदा रहने की पहली पहचान है। मुर्दे कभी आंदोलित हो ही नहीं सकते हैं। यह जीवंतता ही है जो हर समय  अपने अधिकारों, समाज से जुड़े सवालों, और भविष्य के प्रति सजग और सचेत रखती है। यही चैत्यन्तता है जो चेतना से जुड़ी है और जड़ता के निरन्तर विरोध में खड़ी रहती है। भारत के हज़ारो साल के बौद्धिक इतिहास में यही आन्दोलनजीविता सम्मान पाती रही है। पर यह चैत्यन्तता और आन्दोलनजीविता, सत्ता को अक्सर असहज भी करती रही है, और वह सत्ता चाहे, धार्मिक सत्ता हो, या राजनीतिक सत्ता या सामाजिक एकाधिकारवाद की सत्ता।

सत्ता को अक्सर खामोश, सवालों से परहेज करने वाले, पूंछ हिलाते हुए, दुम दबाकर आज्ञापालक समुदाय रास आते हैं। उन्हें श्रोता पसंद आते हैं, पर तार्किक और सवाल पूछने वाले नहीं। जब सवाल पूछा जाने लगता है तो, वे झुंझलाते हुए कहने लगते हैं, मैं तुम्हे यम को दूंगा। पर सवाल पूछने वाला यम से भी जब अवसर मिलता है तो, बिना सवाल पूछे नहीं रह पाता है। जी यह कहानी नचिकेता की है। यह उस समय की कहानी है जब चेतना शिखर पर थी, मस्तिष्क दोलायमान रहा करता था और उस दोलन भरी आन्दोलनजीविता को समाज तथा बौद्धिक विमर्श में एक ऊंचा स्थान प्राप्त था।

आन्दोलनजीविता, भारतीय परंपरा, साहित्य, धर्म और समाज का अविभाज्य अंग रही है। आज तमाम आघात प्रतिघातों के बावजूद, यदि भारतीय दर्शन, सोच, विचार और तार्किकता जीवित है तो उसका श्रेय इसी आन्दोलनजीविता को ही दिया जाना चाहिए। ऋग्वेद के समय, जैनियों के प्रथम तीर्थंकर अयोध्या के राजा ऋषभदेव हों या चौबीसवें तीर्थंकर महावीर, बुद्ध का धर्मचक्र प्रवर्तन हो, या बौद्धों की चारो महासंगीतियाँ, या आदि शंकराचार्य का, अद्वैत दर्शन पर आधारित, एक नए युग का सूत्रपात हो, या मध्यकाल का भक्ति आन्दोलन, या ब्रिटिश हुक़ूमत के समय बंगाल और महाराष्ट्र के पुनर्जागरण जिसे इंडियन रेनेसॉ के रूप में हम पढ़ते हैं, और जिसकी शुरुआत राजा राममोहन राय से मानी जाती है या समाज सुधार से जुड़े अनेक स्थानीय आंदोलन, यह सब आन्दोलनजीविता के ही परिणाम रहे है।

राजनीतिक क्षेत्र में भी चाहे, झारखंड और वन्य क्षेत्रो में हुए आदिवासियों के अनाम और इतिहास में जो दर्ज नहीं है, ऐसे आन्दोलन, 1857 का स्वतंत्रचेता विप्लव, अनेक छोटे मोटे हिंसक और अहिंसक आंदोलनों के बाद गांधी का एक सुव्यवस्थित असहयोग आंदोलन यह सब आन्दोलनजीविता ही तो है। यह सब रातोरात या किसी रिफ्लैक्स एक्शन का परिणाम नहीं था। यह उस आग की तरह थी, जो अरणिमंथन की प्रतीक्षा में सदैव सुषुप्त रह्ती है। विवेकानंद, दयानंद, अरविंदो, से लेकर रजनीश ओशो तक हम जो कुछ भी पढ़ते हैं वह सब इसी चेतना का ही परिणाम है जो देश के लम्बे इतिहास में समय समय पर विभिन्न आंदोलनों के रूप में उभरते रहते हैं। दुनियाभर के इतिहास में, आन्दोलनजीविता की इस चेतना ने सदैव सत्ता को चुनौती दी है।

ऐसा भी नहीं है कि यह चेतना सिर्फ हमारे यहां ही प्रज्वलित होती रही हो। ईसा और मुहम्मद का धर्म उनके समय मे उनके समाज की धार्मिक और राजनीतिक सत्ता को एक चुनौती ही थी। इस्लाम का सूफी आंदोलन, मंसूर का अनल हक़, कबीर का धर्म के पाखंड के खिलाफ खड़े हो जाना, नानक का समानता और बंधुत्व पर आधारित सिख पंथ, गोरखनाथ, कीनाराम का अघोरपंथ, यह सब भी ऐसे ही आंदोलनों का परिणाम रहा है। यह भी एक विडंबना है कि जब यही सारे आंदोलन सफल होकर सत्ता में आ गए तो वे जड़ बन गए। अधिकार सुख मादक होता ही है। लेकिन सत्ता तो जड़ बनी रही, पर जनता के मन मे प्रज्वलित चेतना ने फिर सत्ता की जड़ता को ही चुनौती देनी शुरू कर दी। यह एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। यही चरैवेति है, और चरैवेति ही आन्दोलनजीविता है। ज़िंदा समाज की यही पहचान है और यही जिजीविषा है।

(लेखक पूर्व आईपीएस हैं, ये उनके निजी विचार हैं)