आजादी की लड़ाई में मुस्लिम फकीरों और सन्यासियों की कुर्बानियां

आजादी के लिए भारत के प्रथम युद्ध से लगभग 100 वर्ष पहले ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए 1764 में बक्सर की लड़ाई निर्णायक विजय थी। तीन हताश सहयोगियों – मुग़ल सम्राट शाह आलम द्दितीय, अवध के नवाब शुजा- उद-दौला और मीर कासिम को बुनियादी समन्वय के अभाव के चलते निर्णायक पराजय का सामना करना पड़ा देशी शासको के मामलो पर कुछ पकड़ कायम करने के बाद अब अंग्रेज देशी रियासतों की सम्पदा को लूटने और देशी शासको की मदद से बंगाल , बिहार और उड़ीसा पर नियंत्रण कायम करने की साजिश रच रहे थे।

इस राजनितिक परिदृश्य में, तक़रीबन 1763 में पहली बार बंगाल के मुस्लिम फकीरों ने मदारिया पंथ के मुस्लिम सूफी संत मजनू शाह के कुशल नेतृत्व में ईस्ट इंडिया कम्पनी के लुटेरो  के खिलाफ बगावत की। भोजपुरी ब्राह्मण भवानी पाठक ने मजनू शाह के साथ साझा गठजोड़ कायम किया और सन्यासियों के विद्रोह की अगुवाई भी की। उन्होंने अंग्रेजो के प्रति वफादार जमीदारों को  निशाना बनाया तथा छापामार लड़ाई शुरू की और कम्पनी के कारिंदों पर अक्सर औचक हमले करने लगे। विद्रोहियों को सूचनाये गाँव वाले देते थे जो अक्सर उन्हें कम्पनी की सेनाओं की गतिविधि के बारे बताया करते थे। 1769-  70 का अकाल में ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन के परिणामो में से केवल एक था। दूसरा परिणाम, मुस्लिम फकीरों और हिन्दू सन्यासियों जैसे धार्मिक लोगो के जीवन के तौर – तरीको में व्यवधान  था। ये दोनों समूह अपने अनुयाइयो द्वारा दी जाने वाली भिक्षा पर जीवन-यापन करते थे।

बंगाल की धार्मिक परिपाटियो की बहुत थोड़ी समझ रखने वाले ईस्ट इंडिया कम्पनी के प्रशासको ने भिक्षा माँगने को ग्रामीणों के उपर थोपे गये गैर-कानूनी बोझ के रूप में देखा। अत: उन्होंने फकीरों और सन्यासियों द्वारा भिक्षा माँगने पर रोक लगा दी। इसकी प्रतिक्रिया में प्रतिरोध आन्दोलन शुरू हुआ, फकीरों और सन्यासियों के एक समूह को जल्दी ही किसानो का समर्थन प्राप्त हो गया, जो पहले से ही भूमि की नयी राजस्व नीति और अकाल की आपदा से कराह रहे थे।

हालाँकि वे पूरी तरह सगठित नही थे, फिर भी वे मजनू शाह और उनके सहयोगियों मुसा शाह और चिराग अली, भवानी पाठक, देवी चौधरानी, कृपानाथ, नुरुल मोहम्मद, पीताम्बर आदि के संयुकत नेतृत्व में समूचे बंगाल और बिहार में अपनी आजादी, संस्कृति और धर्म के लिए लड़ने हेतु उत्पीडित किसानो को प्रेरित करने में सफल रहे। 1770 के दशक में फकीरों और सन्यासियों की संख्या बढ़कर 50 हजार या इससे अधिक हो गयी और उन मौको पर जब उन्होंने ईस्ट इंडिया कम्पनी के खिलाफ खुली लड़ाई में हिस्सा लिया, वे मैदान में 60 हजार तक सैनिको को उतार सके।

चूँकि विद्रोही, अंग्रेजी सेना की तुलना में बहुत गतिशील थे और खतरा होने पर दुर्गम जगहों पर शरण ले सकते थे , इसलिए ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए गुरिल्ला छापेमारी को रोकना और उन्हें शिकस्त देना मुश्किल था। 1767 से लेकर 1786 तक मजनू शाह के कुशल नेतृत्व में विद्रोहियों ने रंगपुर, राजशाही, कूच बिहार, जलपाईगुड़ी, कोमिला और ढाका जैसी जगहों पर ईस्ट इंडिया कम्पनी के ठिकानों पर अंसख्य हमले किये, छापे अनिश्चित काल तक जारी रहते पर 8 दिसम्बर 1786 को फकीरों – सन्यासियों ने बदकिस्मती से अंग्रेजी सेना के साथ आमने – सामने की लड़ाई शुरू कर दी।

हताहतो की संख्या जबर्दस्त थी और विद्रोहियों ने कमोवेश अपने सभी साथी खो दिए। विद्रोह के आवेग की लौ अन्तत: मद्दिम हो गयी। मजनू शाह की मृत्यु के बाद आन्दोलन धीरे-धीरे अपनी दिशा खोता चला गया। फिर भी मुसा शाह, चिराग अली शाह, नुरुल मोहम्मद, रमजानी शाह, जहूरी शाह, पारागल शाह, शोभन शाह, मदार बख्श, जरी शाह, ईमान शाह, करीम शाह, नेगू शाह, बुद्दू शाह, कृपानाथ, रौशन शाह, अनूप नारायण और श्रीनिवास आदि की तरह के उनके काबिल सहयोगियों ने 1800 के आखिर तक विद्रोह की लौ को जलाए रखा। 1790 के दशक के आखिर में विद्रोह बिखर गया और वस्तुत: बंगाल के सभी हिस्से अंग्रेजो के नियंत्रण में आ गए। अपनी विफलता के वावजूद फकीरों और सन्यासियों के विद्रोह ने 19वी और 20वी सदी के दौरान आजादी के लिए भावी संघर्षों, खासकर गुरिला के रूप में ज्ञात वहाबियो और अग्नि युग के क्रान्तिकारियो पर अमित छाप छोड़ी।

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