ओवैसी के साथ ‘सामाजिक विभाजन’ की तरफ बढ़ रहे मुसलमान!

निसार अहमद सिद्दिक़ी

भारत की मुस्लिम राजनीति में आज हर तरफ AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ही दिखते हैं। टीवी, अख़बार, न्यूज़ पोर्टल और यू-ट्यूब चैनल्स पर ओवैसी छाए रहते हैं। वह काफी आक्रामक तरीक़े से मुस्लिम क़ौम की आवाज़ उठाते हुए दिखते हैं। हालांकि देश में दूसरी पार्टियों से भी कद्दावर और बड़े मुस्लिम नेता हैं, लेकिन मीडिया में सिर्फ़ ओवैसी ही दिखाई पड़ते हैं। ओवैसी का दिखाया जाना महज़ एक संयोग है या प्रयोग? इसका जवाब जानने के लिए इतिहास के पन्ने पलटने होंगे और सबसे पहले ओवैसी के सियासी इतिहास को जानना होगा कि आख़िर ओवैसी और उनका ख़ानदान किस तरीक़े की राजनीतिक विरासत और विचारधारा से आता है। सबसे पहले बात उनकी पार्टी की करते हैं।

AIMIM जिसका फ़ुलफॉर्म ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन है। अगर इसका हिन्दी अनुवाद किया जाए तो अर्थ होगा- “मुस्लिम एकता का अखिल भारतीय परिषद”। पार्टी के नाम से राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों की एकता संदर्भित होती है। यह ठीक बीजेपी और आरएसएस की लाइन पर चलना ही है जैसे वह हिन्दुत्व की राजनीति की बात करते हैं। दूसरा उनकी पार्टी ऐसा इतिहास रहा है जिसे ख़ुद ओवैसी शायद ही भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुकूल मानते होंगे। ओवैसी की पार्टी मजलिस के इतिहास को दो भागों में बांटकर देखा जा सकता है। पहला भाग 1928 से 1948 तक का है। 1928 में नवाब महमूद नवाज़ ख़ान ने मजलिस की स्थापना की थी, जिसका मकसद हैदराबाद राज्य को एक मुस्लिम राज्य बनाए रखने की वकालत करना था। 1948 में तमाम विवादों के बाद जब हैदराबाद का विलय भारत में हुआ था, तब मजलिस पर प्रतिबंध लगा दिया। मजलिस का दूसरा भाग 1957 से शुरू होता है जब कासिम रिज़वी ने पार्टी की कमान को अब्दुल वाहिद ओवैसी के हाथ सौंप दी। अब्दुल वाहिद ओवैसी ने मजलिस के आगे ऑल इंडिया लिखकर इसको राजनीति में उतार दिया। इसके बाद पार्टी की कमान उनके बेटे सलाहुद्दीन ओवैसी से होते हुए पोते असदुद्दीन ओवैसी तक आ गई।

ओवैसी से पूछे जाएं ये सवाल

ओवैसी जो संसद से लेकर सड़क तक संविधान के हवाले से तर्क देते रहते हैं उनसे ये सवाल पूछा जाना चाहिए कि उनकी पार्टी के अंदर लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्य कहां हैं? राजशाही की तरह उनकी पार्टी पर पहले दादा अब्दुल वाहिद ओवैसी का राज था। फिर पार्टी का नियंत्रण पिता सलाहुद्दीन ओवैसी के हाथ आया और अब असदुद्दीन ओवैसी की मजलिस पर हुक़ूमत है और शायद आने वाले वक़्त में उनके बेटे का ही शासन होगा। ओवैसी परिवार का पार्टी पर कब्ज़े की बानगी ऐसे भी देखा जा सकता है कि तेलंगाना विधानसभा के सबसे वरिष्ठ और 6 बार से विधायक मुमताज ख़ान को सदन का नेता न बनाकर अपने छोटे भाई अकबरूद्दीन ओवैसी को बनाया है। यह वही अकबरूद्दीन ओवैसी हैं जिनके 2013 के सांप्रदायिक भाषण पर काफी विवाद हुआ था।

मुस्लिम राज्य की वकालत से उभरी मजलिस को अकबरुद्दीन ओवैसी ने हिन्दू विरोध तक पहुंचा दिया है। अकबरुद्दीन ओवैसी अपने विवादित भाषण में हिन्दू बहुसंख्यकों को सीधे सीधे धमकी देते हैं। 15 मिनट पुलिस हटाकर फैसला करने की सीधी चुनौती देते हैं। इसके अलावा वह हिन्दू देवी-देवताओं पर भी अभद्र टिप्पणी करते हैं। ओवैसी की ये धमकियां बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय को आरएसएस और बीजेपी के और करीब ले जा रही हैं क्योंकि जिस तरीक़े से ओवैसी खुली चुनौती देते हैं, वह सामान्य और सेक्यूलर हिन्दू वोटर को भी सोचने पर भी मज़बूर कर देती हैं। फिर ये वोटर बीजेपी के एजेंडे के साथ ना चाहते हुए भी चलने को विवश होने लगते हैं। ऐसी स्थिति में जातिय गोलबंदी ना होकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होने लगता है। ये स्थिति बीजेपी और आरएसएस के लिए काफी फायदेमंद है और ओवैसी की राजनीति उसके लिए पॉवरबूस्टर है। शायद यही वजह है कि ओवैसी बंधू मीडिया में होने वाली सांप्रदायिक और धार्मिक बहसों के लिए पसंदीदा मेहमान होते हैं।

इसके अलावा ओवैसी अपने आपको एकमात्र ऐसे मुस्लिम नेता के तौर पर पेश करते हैं जो देश में मुसलमानों की सच्ची आवाज़ है। यह ठीक ऐसे ही जैसे मोहम्मद अली जिन्नाह 40 के दशक में ख़ुद को पेश किया करते थे। मजलिस भी मुस्लिम लीग की तरह ख़ुद को मुस्लिमों की हितैषी पार्टी साबित करती है। इसके अलावा मौजूदा राजनीतिक हालात बिल्कुल वैसे ही हैं जब सेक्यूलरिज्म की बात करने पर मौलाना अबुल कलाम आज़ाद समेत तमाम कांग्रेस नेताओं को “इस्लाम का गद्दार”, “नुमाइशी बच्चे” और “भाड़े के टट्टू” कहा जाता था। ठीक उसी तरह ओवैसी के समर्थक सेक्यूलर नेताओं को “क़ौम का गद्दार” और “जुम्मन” से लेकर तमाम तरह की ऐसी संज्ञाएं देते हैं, जिसे ना तो लिखा जा सकता है, ना ही बोला जा सकता है। एक बात और ग़ौर करने वाली है कि जैसे जिन्नाह चाहते थे कि ज़्यादा से ज़्यादा मुस्लिम बाहुल्य सीटें हासिल कर कांग्रेस को लखनऊ समझौते की तरह एक अन्य समझौते के लिए विवश किया जाए। ठीक वैसे ही ओवैसी की भी यही चाहत है कि ज़्यादा से ज़्यादा मुस्लिम बाहुल्य सीटें हासिल कर दूसरी पार्टियों को गठबंधन के लिए विवश किया जाए।

मुस्लिम लीग और ओवैसी की राजनीति

मुस्लिम लीग की तरह ओवैसी को भी सिर्फ़ उन्हीं सीटों पर जीत मिल रही है, जहां मुस्लिमों के वोट 50 फीसदी से ज़्यादा हैं। ओवैसी की जीत की बड़ी वजह है मुस्लिमों का आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक तौर पर पिछड़ापन भी है। साथ ही मुस्लिम नौजवानों को ऐसा लगता है कि आज़ादी के 70 सालों में देश की तमाम सेक्यूलर पार्टियों ने उनके साथ सौतेला व्यवहार किया है। उनको मुख्यधारा में आने के लिए बराबर के मौक़े नहीं मिले। ओवैसी की पार्टी के नेता मुसलमानों के बीच इस बात का जोर-शोर से भी प्रचार-प्रसार करते हैं। जिस तरीक़े का प्रचार मजलिस के नेता करते हैं ठीक ऐसा ही प्रोपेगैंडा बीजेपी और संघ भी करती है कि लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में यादवों और बसपा के शासनकाल में जाटवों के अलावा किसी अन्य जाति का विकास नहीं हुआ। बीजेपी इसी थ्योरी पर कई राज्यों में सरकार बनाई है। हरियाणा में ग़ैर जाटों को एकजुट कर सरकार बनाई, झारखंड में ग़ैर आदिवासियों की एकजुटता से सत्ता के शिखर तक पहुंची, तो वहीं यूपी में ग़ैर यादव ओबीसी और ग़ैर जाटव दलितों को एकजुट कर सरकार बनाने में सफलता हासिल की।

ओवैसी भी ऐसे ही भ्रामक प्रचारों के ज़रिए दूसरे राज्यों में अपने पांव जमाना चाहते हैं। बिहार में उनको सफलता भी मिली है, जहां उनकी पार्टी के 5 विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं। ये सभी विधायक मुस्लिम बाहुल्य सीटों से ही जीते हैं। लेकिन ऐसी जीत का क्या फ़ायदा जब सत्ता में कोई भागेदारी नहीं हो। ऐसा पहली बार हो रहा है जब बिहार सरकार में कोई मुसलमान मंत्री नहीं है। शासन-सत्ता में बिना भागेदारी के विकास की सीढ़िया चढ़ पाना बहुत मुश्किल होता है। दूसरी सत्ता की हनक लोकल थाने से लेकर राजधानी तक रहती है। ओवैसी भले ही राज्य की 5 विधानसभा सीटों पर हासिल कर लिए हों, उनकी इस जीत के पीछे सबसे बड़ी हार यह है कि मौज़ूदा बिहार सरकार में राज्य की 16 फीसदी मुस्लिम आबादी का कोई नुमाइंदा नहीं रह गया है।

वहीं जो मुस्लिम नौजवान अपनी पसमांदगी के लिए कांग्रेस, सपा, बसपा सहित तमाम सेक्यूलर दलों को ठहराते हैं। उन्हें अपनी मौजूदा हालत का अंदाज़ा लगाने से पहले पड़ोसी देशों ख़ासतौर पर पाकिस्तान-बांग्लादेश के हिन्दुओं और श्रीलंका के तमिलों की हालत देख लेनी चाहिए। यही नहीं उन्हें म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों की स्थिति का भी मूल्यांकन करना चाहिए क्योंकि वहां से प्रताड़ित कर भगाए गए रोहिंग्या मुसलमान उनके बीच शरणार्थी बनकर रहते हैं। इन सब की तुलना में भारत के मुसलमान बेहतर स्थिति में हैं और इसकी सबसे बड़ी वजह देश का लोकतांत्रिक, सेक्यूलर और संवैधानिक ताना-बाना है। लेकिन ओवैसी के समर्थक सेक्यूलरिज़्म को ऐसे पेश करते हैं जैसे यह सेक्यूलरिज़्म ही उनके विकास के लिए सबसे बड़ा बाधक है। यह बिल्कुल जिन्नाह और उनकी मुस्लिम लीग की तरह ही है जब वह कांग्रेस की सेक्यूलर राजनीति को मुस्लिम विरोधी ठहराकर मुस्लिमों की गोलबंदी किया करते थे। मुस्लिम सियासत अब फिर से उसी मुहाने पर आ खड़ी हो गई है। क़ायद-ए-आज़म जिन्नाह से क़ायद-ए-मिल्लत (कुछ लोग नकीब-ए-मिल्लत कहते हैं) ओवैसी तक आ गई है। क़ायद-ए-आज़म ने हिन्दोस्तान के मुसलमानों के बीच तीन सरहदें (भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश) पैदा कर दिया था। वहीं ओवैसी की राजनीति भारतीय मुस्लिमों के लिए हर शहर, हर क़स्बे और हर गांव में नई सरहदें खड़ी कर देगी। क्योंकि सेक्यूलर राजनीति ने अभी भी देश की तमाम जातियों और समुदायों को एकजुट रखा हुआ है और मुसलमानों के साथ उनका सियासी गठजोड़ भी सांप्रदायिकता को दूर रखा हुआ है।

लेकिन ओवैसी अगर मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर जीत हासिल करते चले गए तो इन सेक्यूलर पार्टियों और जातियों के पास सांप्रदायिक राजनीति के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। ऐसी स्थिति मुसलमानों के लिए काफी भयावह है क्योंकि मौजूदा राजनीतिक हालात देख के ऐसा ही प्रतीत होता है कि मुसलमान शायद ओवैसी के साथ अकेला पड़ जाएगा। मुसलमानों को समझना होगा कि जज़्बातों में उफनता समुदंर जब तूफान लाता है वह तबाही के निशान छोड़ जाता है। जिन्नाह के जज़्बातों के सैलाब ने हिन्दोस्तान के मुसलमानों को ऐसा अंतहीन दर्द दिया जिसकी क़ीमत ना जाने कितनी नस्लों को चुकानी पड़ेगी। ठीक उसी तरह से ओवैसी की राजनीति से उफान मार रहा जज़्बात किसी भयंकर तबाही की तरफ ले जा रहा है, जिसकी कल्पना करना शायद अभी मुश्किल है।

(लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया में रिसर्च स्कॉलर हैं, ये उनके निजी विचार हैं)