मोदी सरकार में हाशिये पर रह गया ओबीसी वर्ग, देखें क्या है पूरी सच्चाई?

दिलीप मंडल

नरेंद्र मोदी की ओबीसी के प्रति नफ़रत का राज क्या है? उन्होंने अपने पीएमओ में एक भी ओबीसी अफ़सर नहीं रखा. किसी ओबीसी को कैबिनेट में महत्वपूर्ण मंत्रालय नहीं दिया, ओबीसी के वेतनभोगी लोगों के बच्चों पर क्रीमी लेयर लगाने की कोशिश की, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के 27% ओबीसी कोटा क़ानून पर संविधान संशोधन नहीं. 13 प्वायंट पोस्टर लगाकर ओबीसी को यूनिवर्सिटी में टीचर बनने से रोकने की कोशिश की, लैटरल एंट्री के ज़रिए ओबीसी का 27% कोटा हड़प कर सवर्णों को देने की कोशिश, बिना आँकड़ा जुटाए ओबीसी को बाँटने की घोषणा और फिर अति पिछड़ों को कुछ न देना, – ओबीसी को सेंट्रल यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर बनने से रोकना, निजीकरण के ज़रिए ओबीसी को सरकारी नौकरी में आने से रोकने की कोशिश, एक भी ओबीसी को केंद्र सरकार में सेक्रेटरी के सर्वोच्च पद तक न पहुँचने देना.

कोई आदमी ओबीसी से इतनी घृणा कैसे कर सकता है। वह भी ऐसा आदमी जो हर विधानसभा और लोकसभा चुनाव से पहले कम से कम तीन बार ये दावा करता है कि वह ओबीसी है। पिछड़ी माँ का बेटा है। इसका रहस्य ये है कि नरेंद्र मोदी RSS की लॉन्ग टर्म योजना के तहत 27 फ़रवरी, 1999 में ओबीसी बनाए गए। उस समय गुजरात और केंद्र में बीजेपी का शासन था। मोढ घोंची जाति वैश्य है। घांची अलग जाति है जो तेल का काम करती है। गुजरात सरकार की सिफ़ारिश पर केंद्र सरकार ने मोढ घोंची को ओबीसी की केंद्रीय लिस्ट में शामिल किया। इसके लिए न कोई माँग थी, न कोई आंदोलन था।

केंद्र सरकार गजट संख्या 12011/68/98- BCC लाकर ये काम किया गया और इस तरह नरेंद्र मोदी 1999 में ओबीसी बन गए। उनकी जाति को ओबीसी केंद्रीय सूची में गुजरात के अध्याय में 23 नंबर पर एंट्री मिल गई। यूपीए-2 ने जब अर्जुन सिंह को साइड किया, ओबीसी को लेकर सुस्ती बरती, जातिवार जनगणना की हत्या कर दी तो RSS ने नरेंद्र मोदी की ओबीसी नेता के तौर पर पैकेजिंग कर दी और बाज़ार में उतार दिया।  2012 में नरेंद्र मोदी पहली बार ओबीसी बनकर सामने आते हैं। जब प्रियंका गांधी ने कहा कि मोदी उनके मृत पिता पर हमला करके नीच हरकत कर रहे हैं तो मोदी ने कहा कि हाँ मैं नीची जाति का हूँ, पिछड़ा हूँ, इसलिए प्रियंका मेरा मज़ाक़ उड़ा रही है। सवर्णों को पता है कि यह अपना आदमी है। ओबीसी तो वह सिर्फ काग़ज़ पर है। ओबीसी के लोग चकमा खा गए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)