रश्मि और सामंत और दिशा रविः पढ़े लिखे वर्ग की सांप्रदायिक कुंठा का इलाज कैसे होगा?

हमारे सामने दो ख़बरें हैं, पहली ख़बर इंग्लैंड से है, और दूसरी ख़बर भारत से ही है। लेकिन दोनों ख़बरों का संबंध भारत से ही है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट यूनियन की पहली भारतीय महिला प्रेसिडेंट चुनी गईं रश्मि सामंत ने पद से इस्तीफा दे दिया है। दरअस्ल रश्मि की पुरानी सोशल मीडिया पोस्ट्स के वायरल होने और खुद पर नस्लीय आधार पर भेदभाव करने के आरोपों के बाद रश्मि सामंत ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया है। जिस पोस्ट को लेकर रश्मि को इस्तीफा देना पड़ा  है, वह पोस्ट मलयेशिया घूमने के दौरान की गई थी, इसमें रश्मि ने अपनी एक तस्वीर को इंस्टाग्राम पर शेयर करते हुए कैप्शन में ‘चिंग चांग’ लिखा था। इसे यहूदी और चीनी छात्रों के लिए गलत माना जाता है।

स्टूडेंट यूनियन की डिबेट्स के दौरान उनकी तुलना हिटलर जैसे तानाशाह से की जा रही थी। लेकिन इसके बावजूद रश्मी ने चुनाव ने चुनाव जीता था। कर्नाटक के मणिपाल की रहने वाली रश्मि सामंत ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ चुनाव में 1966 वोट हासिल हुए थे। जानकारी के लिये बता दें कि अध्यक्ष पद के लिए कुल 3,708 वोट पड़े थे। अब रश्मि सामंत ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर भारत लौट आईं हैं। नस्लीय टिप्पणी के लिये भले ही उन्हें इंग्लैंड में आलोचना का सामना करना पड़ा हो, लेकिन भारत में उनके लिये अपार संभावनाएं हैं। अगर वे चाहें तो भाजपा में शामिल होकर भारत में वह सब हासिल कर सकतीं हैं, जो वे इंग्लैंड में नहीं कर पाईं।

भारतीय जनता पार्टी में जयंत सिन्हा का शुमार भाजपा के चोटी के नेताओं में होता है। उन्होंने हॉवर्ड से पढ़ाई की है। हॉवर्ड से पढ़ाई पूरी करने के बाद वे भाजपा में शामिल हुए, चुनाव लड़ा लोकसभा के सदस्य बने और फिर केन्द्रीय मंत्रीमंडल में शामिल हो गए। हॉवर्ड से पढ़ने के बाद भी उन्होंने सांप्रदायिकता का त्याग नहीं किया। जयंत सिन्ह ने उन लोगों को माला पहनाकर सम्मानित किया जिन्होंने अलीमुद्दीन नाम के एक शख्स को गौमांस ले जाने के आरोप में पीट-पीट कर मार दिया था। फास्ट ट्रैक कोर्ट ने उन्हें मुजरिम करार दिया, लेकिन जैसे ही ये हत्यारे ज़मानत पर जेल से बाहर आए तो जयंत सिन्हा ने उन्हें माला पहनाकर मिठाई खिलाकर उनका सम्मान किया। नस्लीय टिप्पणी के कारण ऑक्सफोर्ड के छात्रसंघ अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने वाली रश्मि सामंत को जयंत सिन्हा से कुछ सीखना चाहिए, और भाजपा में अपना भविष्य तलाशना चाहिए।

 

अब दूसरी ख़बर देखिए! नवंबर 2020 से दिल्ली में आंदोलन कर रहे किसानों के समर्थन में अंतर्राष्ट्रीय सेलेब्रेटीज ने ट्वीट किये। सरकार को लगा कि इसमें ‘साजिश’ है, इस मामले में दिल्ली पुलिस ने फ़्राइडेस फ़ॉर फ़्यूचर इंडिया नामक संगठन की पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि को गिरफ्तार कर लिया। दिश रवि की गिरफ्तारी पर उनके पिता को गुस्सा आया। बेटी की गिरफ्तारी पर पिता का गुस्सा वाजिब है। दिशा रवि के पिता ने गुस्सा ज़ाहिर करते हुए कहा कि “हमने भाजपा को वोट मुसलमानों को गिरफ्तार करने के लिए दिया था अपने बच्चों को नहीं।” ज़ाहिर है दिशा के पिता भी अनपढ़ जाहिल नहीं हैं, वे भी पढ़े लिखे हैं, लेकिन उनकी मानसिकता पर उस वक्त तरस आया, जब उन्होंने भाजपा को वोट देने का मक़सद बताया। दिशा के पिता की इस स्वीकारोक्ति पर नाराज़गी ज़ाहिर करने की जरूरत नही हैं। ऐसे न जाने कितने लोग हैं जिन्होंने ‘गुजरात मॉडल’ की मानसिकता के तहत भाजपा को वोट दिया था। ऐसे ‘पढ़े लिखे’ तबके को बीमार न कहा जाए तो और क्या कहा जाए? इसे कुंठित, सांप्रदायिक, मनोरोगी न कहा जाए तो क्या कहा जाए?

आज देश के जो हालात हैं वे सबके सामने हैं। किसान आंदोलित हैं, युवा बेरोजगार है, मंहगाई कमर तोड़ रही है, जीडीपी रसातल में लग चुकी है। यह देश एक संप्रदाय विशेष से नफरत करने की क़ीमत चुका रहा है, और पता नहीं आगे और कितनी क़ीमत चुकानी है। महान स्वतंत्रता सेनानी मौलाना मज़हरूल हक़ ने कहा था कि ‘हम हिन्दू हों या मुसलमान, हम एक ही नाव पर सवार हैं। हम उबरेंगे तो साथ, डूबेंगे तो साथ!’ लेकिन इस देश का एक बहुत बड़ा वर्ग मौलाना मज़हरुल हक़ के वास्तविक राष्ट्रवादी संदेश से भटक कर अपने ही देश के नागरिक की नफरत में अंधा हो गया, और एक ऐसी पार्टी के पाले में जा खड़ा हुआ जिसका वजूद ही मुस्लिम विरोध पर टिका हुआ है, वह इतना बेबस है कि यह भी नहीं कह सकता कि उसे मंहगा पेट्रोल मंज़ूर नहीं, बेरोजगारी, मंजूर नहीं, मंहगाई, भुखमरी के खिलाफ वह आंदोलनरत है। जल्द ही वह भी दिशा रवि के पिता की तरह स्वीकार करेगा कि गुजरात मॉडल से उसे क्या मिला। किसी शायर ने क्या ख़ूब कहा है कि-

हम जो डूबे हैं अब तक तो बड़े ताव में हो,

तुम ये क्यों भूल गए तुम भी इसी नाव में हो।