संजय कुमार सिंह का सवालः संसद में रंजन गोगोई की पोल खुलने से बचाना क्यों जरूरी था?

Sanjaya Kumar Singh
संजय कुमार सिंह

क्या पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर उनकी सहायक ने यौन उत्पीड़न का आरोप नहीं लगाया था? तथ्य है उनपर आरोप था। क्या पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने उपरोक्त मामले में खुद के खिलाफ एक अदालती मामला दायर किया था? तथ्य यह है कि वाकई ऐसा हुआ था। क्या पूर्व सीजेआई उस पीठ में नहीं थे जिसे यह मामला सौंपा गया था? तथ्य है कि वे वास्तव में पीठ का हिस्सा थे, हालांकि, अंतिम निर्णय उन्होंने नहीं लिखा था।

क्या पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने अपने अंतिम दिनों में एक आदेश नहीं दिया था जिसमें स्वीकार किया गया था कि राम जन्मभूमि सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए और सभी संदेह से परे, भगवान राम की जन्मभूमि नहीं है, फिर भी बहुसंख्यकों की इच्छा के अनुसार वह भूमि हिंदुओं को दे दी गई? तथ्य यह है कि उन्होंने वास्तव में ऐसा किया था। क्या पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद भाजपा के नामांकन पर राज्यसभा का सदस्य बनने का प्रस्ताव स्वीकार किया। तथ्य यह है कि वाकई उन्होंने किया, वह भी  सेवानिवृत्ति के तीन महीनों के अंदर।

क्या पूर्व मुख्य न्यायाधीश को राज्यसभा सदस्य के रूप में सेवानिवृत्ति के बाद जेड श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त है? तथ्य है, वास्तव में ऐसा है। तो वह क्या है जो भाजपा के सांसद और कानून मंत्री को परेशान करता है। सुश्री मोइत्रा ने एक भी शब्द गलत नहीं बोला। और वह मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ नहीं बल्कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ बोल रही थीं।

ये पूर्व मुख्य न्यायाधीश भारत के इतिहास में अकेले ऐसे मुख्य न्यायाधीश हैं जिनके कार्यालय में भारत के प्रधान मंत्री स्वयं गए थे। इस दौरे के बाद रफाल सौदे में क्लीन चिट दी गई जो सुप्रीम कोर्ट को सीलबंद लिफाफे में दिए गए तथ्यों के आधार पर थी। इन सीलबंद लिफाफों का विवरण कभी सार्वजनिक नहीं किया गया।

बहुत समय नहीं हुआ, मेरे मित्र संजीव भट्ट ने भी सुप्रीम कोर्ट को एक सीलबंद लिफाफे में बयान दिया था। इससे पहले कि लिफाफे की लेई सूखती, लिफाफे की सामग्री गुजरात पहुंच गई और संजीव भट्ट के खिलाफ कई मामले जो गुजरात सरकार रोक रखे गए थे क्योंकि संजीव भट्ट ने अपने कर्तव्य निर्वहन के लिए काम किया था, फिर से खोल दिए गए और उसका उत्पीड़न शुरू हो गया।

वे 5 सितंबर, 2018 से ऐसे दो मामलों में जेल में बंद हैं। उनकी हालिया जमानत अर्जी न्यायमूर्ति एम आर शाह को सौंपी गई। प्रसंगवश एम आर शाह ने हाल ही में नरेंद्र मोदी की प्रशंसा एक दूरदर्शी नेता के रूप में की है।

इस मामले में एक भी शब्द बोले जाने से पहले ही संजीव भट की जमानत याचिका पर क्या होने वाला है आप जानते हैं।

टीएमसी सांसद के तेवर

टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने लोकसभा में यह कहा कि भाजपा जिसे वीरता बता रही है वह असल मे कायरता है। भाजपा से पहले की सरकारों ने ये काम नहीं किए क्योंकि ये काम “गैरजरूरी” थे। पहले की सरकारें “जरूरी” और “गैरजरूरी” में फर्क करती थीं। सासंद महुआ मोइत्रा ने सब कुछ बोलकर, सांसद के रूप में अपने अधिकारों और कर्तव्यों की चर्चा करके, यह उम्मीद जताकर कि उन्हें रोका नहीं जाएगा, प्रसारण बंद नहीं होगा, बोलना शुरू किया पर भाजपा के मंत्रियों ने नियमों का गलत हवाला देकर उन्हें रोकने की कोशिश की। बोलना जारी रखने की इजाजत मिलने के बावजूद उन्हें फिर रोकने की कोशिश की गई। यह चर्चा भी उड़ी कि सांसद के खिलाफ कार्रवाई होगी। हालांकि, सांसद महुआ मोइत्रा ने ट्वीट कर कहा कि भारत के इस सबसे मुश्किल समय में सच बोलने के लिए मेरे खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाया जाए तो यह वाकई मेरा विशेषाधिकार होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)