लाल किले का धार्मिक इस्तेमाल

By राकेश अचल

दिल्ली का लाल किला केवल एक किला नहीं है बल्कि अपने आप में इतिहास की एक किताब है. पत्थरों पर शाहजहां द्वारा लिखी गयी इस किताब में अब एक नया अध्याय और जुड़ने वाला है.

राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक इस लाल किले का पहली बार धार्मिक इस्तेमाल किया जा रहा है. देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी गुरुवार को गुरु तेग बहादुर की 400 वीं जयंती पर  सूर्यास्त के बाद मुगल-युग के स्मारक लाल किले  पर भाषण देने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री होने वाले हैं. मोदी लाल किले से राष्ट्र को संबोधित करेंगे. अंतर सिर्फ इतना होगा कि प्रधानंमत्री लाल किले की प्राचीर से नहीं, बल्कि लॉन से राष्ट्र को संबोधित करेंगे.

सरकार का मानना है कि चूंकि इसी किले से मुगल शासक औरंगजेब ने 1675 में सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर को फांसी देने का आदेश दिया था, इसी कारण है कि लाल किले को गुरु तेग बहादुर की 400 वीं जयंती के आयोजन स्थल के रूप में चुना गया.

आपको याद होगा कि  लाल किले की प्राचीर वह जगह है जहां से प्रधानमंत्री स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्र को संबोधित करते हैं. स्वतंत्रता दिवस के अलावा, यह दूसरी बार है जब कोई प्रधानमंत्री इस ऐतिहासिक स्मारक से भाषण देगा. प्रधानमंत्री चाहते तो लाल किले के ही पास चांदनी चौक में गुरुद्वारा सीस गंज साहिब से भी राष्ट्र को सम्बोधित कर सकते थे , यह गुरुद्वारा उस जगह पर बनाया गया है जहां मुगलों ने गुरु तेग बहादुर का सिर काटा था, गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब, जो संसद के पास है,लेकिन यहां से राष्ट्र को सम्बोधित करने से कोई इतिहास नहीं बनता.

अतीत में झांकें तो आपको पता चलेगा कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ किलों में शुमार इस लाल किले का निर्माण मुगल सम्राट शाहजहां द्धारा 1638 ईसवी मेंशुरू कराया गया था. भारत के इस भव्य लाल किले का निर्माण काम 1648 ईसवी तक करीब 10 साल तक चला।शाहजहां का लाल किला पहले से आगरा में था लेकिन जब वे अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली लेकर आने लगे तो उन्होंने दिल्ली में भी आगरा जैसा ही लाल किला तामीर करा दिया. 384 साल पुराने इस किले पर अनेक शासक आये और चले गए. आजादी के बाद सबसे पहले देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इस पर तिरंगा फहराकर देश के नाम संदेश दिया था. लाल किले का इस्तेमाल सैनिक प्रशिक्षण के लिए किया जाने लगा और फिर यह एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रुप में मशहूर हुआ, अब यहां फिर से एक नया इतिहास लिखा जा रहा है ,जो मौजूदा सत्ता से नाराज सिखों को एक बार फिर से अपने साथ लाने की कवायद है.

ये पहला मौक़ा है कि यहां एक धार्मिक कार्यक्रम किया जाएगा. इस कार्यक्रम का आयोजन संस्कृति मंत्रालय द्वारा दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सहयोग से किया जा रहा है. मंत्रालय ने कहा कि इस कार्यक्रम में देश भर के 11 मुख्यमंत्री और प्रमुख सिख नेता शामिल होंगे. इसमें 400 सिख ‘जत्थेदारों’ के परिवारों को भी आमंत्रित किया गया है, जिनमें अमृतसर के स्वर्ण मंदिर  के लोग भी शामिल हैं. इससे पहले 2018 में प्रधानमंत्री मोदी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा आजाद हिंद सरकार के गठन की 75वीं वर्षगांठ मनाई थी और लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया था.

गुरु तेग बहादुर के 400वें प्रकाश पर्व पर पीएम मोदी के भाषण के लिए लाल किले की सुरक्षा व्यवस्था को बढ़ा दिया है. लाल किले में  दिल्ली पुलिस  के 1000 अतिरिक्त जवानों की तैनाती की गई है. लाल किले परिसर में 100 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं, इसके साथ ही ड्रोन कैमरों का भी इंतजाम किया गया है, ताकि किसी तरह की चूक न हो. रथ यात्रा से बुलडोजर यात्रा तक का इस्तेमाल कर चुकी भाजपा सरकार के लिए अब इस्तेमाल के लिए लाल किला ही बचा था. आपको याद होगा कि हाल के पंजाब विधानसभा चुनाव में सिख बहुल पंजाब ने भाजपा को सिरे से ख़ारिज कर दिया था. इसलिए इस नाराज समाज को मनाने के लिए प्रकाश पर्व का सहारा लिया गया है .बहरहाल भाजपा पूरे देश में अपने ढंग से इतिहास का लेखन कर रही है.

भाजपा के सत्ता में आने के बाद पहली बार देश में पिछले दिनों 900 स्थानों पर रामनवमी के जुलूस निकले गए. मध्य प्रदेश के दतिया में पहली बार माँ पीतांबरा की रथ यात्रा निकली जा रही है .पूरे शहर को पीले रंग से रंगा जा रहा है सरजू से लेकर क्षिप्रा तक पहले ही असंख्य दीपक जलाने की प्रतिस्पर्द्धा पहले ही की जा चुकी है और कीर्तिमान बनाये जा चुके हैं. लाल किला भी उत्सुकता से देश के 14  वे प्रधानमंत्री का भाषण सुनने को उत्सुक है ,क्योंकि इस समय देश साम्प्रदायिकउन्माद के दौर से गुजर रहा है .आप भी अपना समय आरक्षित रखिये इस ख़ास अवसर के लिए.

((लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं))

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