रवीश का लेखः यूक्रेन में तबाह मकानों के बीच दिग दिगंत कूदंत पत्रकारिता का उदय

इस पत्रकारिता के तहत जहां से कूद कर जहां तक जाना होता है, वहाँ से कूद कर वहाँ तक वापस भी आना होता है। कूदंत पत्रकारिता बंदरों को मानव सभ्यता के आचरणों में ढालने के काम आती है। इससे बंदर भ्रमित और भयभीत होकर कूदना छोड़ देते हैं। जब समाज में ख़बरों को देखने और समझने की क्षमता समाप्त हो जाती है तब कूदंत पत्रकारिता का उदय होता है।

SPG से आग्रह है कि प्रधानमंत्री को इस कूदंत पत्रकार से दूर रखे। या फिर इंटरव्यू स्थल को इनके कूदने की क्षमताओं हिसाब से तैयार करे। नौकरी नाम की मजबूरी इंसान से कुछ भी करा सकती है। इस महंगाई में जीने के लिए कूदना पड़े तो कूद लीजिए। शर्म नाम की चीज़ को ख़ुद से अलग कीजिए। जिस जगह पर लाशें बिछी हैं, लोग मारे गए, उनके घर ख़ाक हो गए उस जगह से इस तरह का कवरेज हो रहा है।

कूदंत पत्रकारिकता करने वाली मोहतरमा बता रही हैं कि केवल पत्रकारिता नहीं बल्कि इंसान की गरिमा भी समाप्त हो चुकी है। भारत का समाज पतन से नीचे गर्त में चला गया है। यह पत्रकार एकदिन ख़ुद पर गर्व करेगी कि उसने ऐसा काम किया। उम्मीद है इस बार जब वेतन वृद्धि होगी तब सबसे अधिक वृद्धि स्वामी  के बाद इन्हीं की होगी। इनका होना साबित करता है कि एक दर्शक और नागरिक के रूप में अब आप नहीं हैं।

आइये सारा देश कूदे। यूक्रेन जाकर कूदे। जापान जाकर कूदे। स्टुडियो में कूदे। मैदान में कूदे। कूदने का अंत न हो। यही दिग दिगंत कूदंत पत्रकारिता है। जो लोग पत्रकारिता पढ़ रहे हैं वे किताबें फाड़ दें और कूदें। आप सभी कूदंत पत्रकारिता करें। जब ऐंकर कूद सकता है तो रिपोर्टर क्यों नहीं कूद सकती है। शाज़िया को शुभकामनाएँ। ईश्वर किसी को इतना मजबूर न करे कि ऐसी नौकरी करनी पड़े और नौकरी में ऐसा करना पड़े। ईश्वर के सामने हाथ ही जोड़ सकता हूँ। उनके सामने तो कूद भी नहीं सकता।

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