दांव पर भारत की छवि, मोदी मौन क्यों?

By- Shakeel Akhtar

क्या प्रधानमंत्री मोदी को कमजोर किया जा रहा है? उनका कद कम करने की कोशिशें शुरु हो गई हैं? दुनिया में भारत की यह छवि खराब होना प्रधानमंत्री की ही कमी माना जा रहा है। कुछ महीनों से सब कह रहे थे कि प्रधानमंत्री मोदी को देश में बढ़ रही असहिष्णुता, नफरती बयानों और उससे उपजी हिंसा के खिलाफ बोलना चाहिए। शांति एवं भाईचारे की अपील करना चाहिए। मगर प्रधानमंत्री ने यह नहीं किया। या ऐसा करने से उन्हें रोका गया। धर्म संसद के नाम पर जहरीले बयान दिए गए। खासतौर पर मुसलमानों, महिलाओं और गांधी के खिलाफ। गाली गलौज, बलात्कार की धमिकयां, और एप्स – साइट बनाकर संकिर्णता के खिलाफ लड़ने वाली मुस्लिम लड़कियों के चरित्र हनन की कोशिश।

यह सब करने वाले फ्रिंज एलिमेंट ( हाशिए के लोग) नहीं थे। तमाम लोग इनके खिलाफ लिख रहे थे। इन पंक्तियों के लेखक ने भी कई लेख और पचासों ट्वीट किए होंगे। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने लोकसभा में बोला। राहुल गांधी सहित कई नेता बोले। मगर प्रधानमंत्री मौन ही रहे। यह कौन से प्रधानमंत्री हैं? यह मोदी प्रधानमंत्री हैं। जिनकी सबसे बड़ी योग्यता ही बोलना थी। अपने भाषण, बयानों की ताकत से ही वे दिल्ली तख्त तक आए थे।
मनमोहन सिंह का मौन उनकी विद्वता, गंभीरता से उपजा था। यहां मजबूरी से लगता है। राजनीति के इतने अनुभवों से गुजर कर आए मोदी को क्या यह मालूम नहीं था कि हिन्दू मुसलमान की राजनीति अब नियंत्रण से बाहर होती जा रही है? यह सीधे धर्म के खिलाफ, इस्लाम के विरुद्ध जा रही है। इसके अंजाम खतरनाक होंगे! अभी जो भाजपा के प्रेस नोट में कहा सबकी धार्मिक स्वतंत्रता की बात को क्या यह पहले पता नहीं थी। खूब थी।

पिछले आठ साल में करीब करीब पूरी दुनिया घूमे प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी देख लिया था कि वहां कहीं भी धर्म को लेकर ऐसी सतत राजनीति नहीं है। धार्मिक आधार पर देश के दूसरे सबसे बड़े समुदाय को हमेशा असुरक्षा, भय के माहौल में नहीं रखा जा सकता। विश्व में एक दूसरों के मामलों पर कड़ी नजर रखी जाती है। क्योंकि एक देश का असर दूसरे पर पड़ता है। अच्छी बातें, प्रेम, भाइचारे का असर सकारात्मक पड़ता है। अन्तरराष्ट्रीय जगत के आगे बढ़ने, वैचारिक समृद्ध होने, शांति स्थापना में काम आता है। जबकि नफरत की हवाएं जो ज्यादा तेज बहती हैं दुनिया को पीछे की तरफ धकेलती हैं। इन्हें कोई पसंद नहीं करता। अभी खास तौर से ट्रंप का हश्र देखने के बाद तो बिल्कुल नहीं। अमेरिका में कोई पूर्व राष्ट्रपति इतना अलग थलग नहीं पड़ा होगा जितना डोनाल्ड ट्रंप। अमेरिका के राष्ट्रपति रिटायर होने के बाद दुनिया भर में घूमते हैं। व्याख्यान देते हैं। मगर ट्रंप के अमेरिका में ही कोई नहीं बुलाता। कारण वही है।

उनकी नफरती, विभाजनकारी राजनीति जिसने अमेरिका के शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन को भी सवालों के घेरे में डाल दिया था। भारत इस मामले में अभी तक तो बहुत बेहतर स्थिति में रहा कि यहां सारे पावर ट्रांसफर एकदम शांतिपूर्ण और सहज भाव से हुए। मगर अमेरिका में ट्रंप ने हारने के बाद सत्ता छोड़ने से ही इनकार कर दिया था। उनके लोग संसद में घुस गए थे। हिंसा करने लगे थे। दुनिया ऐसा दृश्य किसी दूसरे मुल्क में देखना नहीं चाहती। इसीलिए नफरत और विभाजन की राजनीति का दुनिया भर में विरोध होता है। भारत में उन पर काबू पाने के बदले उन्हें और प्रोत्साहित किया गया।

छत्तीसगढ़ में महात्मा गांधी के खिलाफ अपशब्द बोलने वाले कालीचरण का जेल से निकलने के बाद तलवारें लहराते हुए स्वागत जुलूस निकाला गया। उस पर कोई कार्रवाई न होने से फिर डीजे पर तेज भड़काऊ गाने बजाकर तलवारें लेकर मस्जिदों के सामने से जुलूस निकाले जाने का नया तरीका शुरू हो गया। तनाव बड़ा। कई जगह दंगे हुए। विदेशी मीडिया में खबरें चलने लगीं। देश के छवि खराब होने लगी। उसी समय सबने प्रधानमंत्री से कहा कि वे शांति की अपील करें। लेकिन मोदी जी चुप बने रहे। इसे मौन स्वीकृति चिन्हम समझा गया। भाजपा की प्रवक्ता नुपूर शर्मा ने सारी सीमाएं लांघते हुए पैगम्बर साहब के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी। देश भर में इसका विरोध हुआ। ऐसे में अमेरिका के विदेश मंत्री ने भारत की धार्मिक स्वतंत्रता पर कड़ी टिप्पणी करके मामले को अन्तरराट्रीय बना दिया।

उसके बाद संघ प्रमुख भागवत का बयान आया कि हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग खोजना जरूरी नहीं है। उस समय सबको लगा कि यह बयान प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से आना चाहिए था। मगर उनकी चुप्पी बरकरार रही। गांधी का अपमान, मुस्लिम महिलाओं को बलात्कार की खुले आम धमकियां, बाबरी मस्जिद के बाद अपने वादे को भूलकर हर मस्जिद पर दावा जताना, फिर भाजपा प्रवक्ता नुपूर शर्मा के साथ नवीन कुमार जिन्दल का पैगम्बर साहब पर अपमानजनक कमेंट और कश्मीर में कश्मीरी पंडितों, यहां से काम करने गए दूसरे कर्मियों, बैंक मैनेजर और अन्य कश्मीरी मुस्लिमों की आतंकवादियों द्वारा हत्याएं, पलायन पर भी प्रधानमंत्री की चुप्पी रहस्य बन गई।

अभी भी अरब देशों की तीव्र प्रतिक्रिया के बाद भाजपा के सचिव के द्वारा बयान जारी करके सर्वधर्म समभाव की बात कही गई। अगर यही बात प्रधानमंत्री मोदी के मुंह से कहलवाई जाती तो उनका कद बढ़ता और दुनिया में उनकी छवि निखरती।


लेकिन उनका मौन अब गहरा रहस्य बनता जा रहा है। मोदी भाजपा और संघ के लिए बहुत बड़े ऐसेट (संपत्ति, ताकत) साबित हुए। 2014 और 2019 की जीत उन्हीं की छवि का परिणाम है। लेकिन क्या अब उन्हें कमजोर बनाया जा रहा है? भाजपा की राजनीति जानने वाले सब जानते हैं कि वहां सर्वोच्च ताकत संघ है। मोदी के बड़े प्रभाव की वजह से कुछ लोगों को यह लगने लगा था कि वे संघ से बड़े हो गए हैं। मगर संघ का नेटवर्क इतना विस्तृत है कि भाजपा के किसी नेता के लिए उससे बड़ा होना संभव नहीं है। बलराज मधोक, वाजपेयी, आडवानी बहुत बड़े नेता हुए हैं। भाजपा जो पहले, दूसरे आम चुनाव के बाद तक कहीं नहीं थी उसे इतनी बड़ी पार्टी बनाने और केन्द्र में सत्ता तक लाने में इन नेताओं के बड़े व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण हाथ है। लेकिन संघ ने जब इनकी उपयोगिता समाप्त हो गई तो इन्हें किनारे धकेलने में जरा भी देर नहीं लगाई।


मोदी या कोई भी इसका अपवाद नहीं हो सकते। खुद भाजपा के लिए, देश के लिए इतने सवाल खड़े होने के बाद भी मोदी के चुप रहने से इन सवालों को बल मिल रहा है। मोदी मास्टरस मेन ( संगठन के अनरूप काम करने वाले) हैं। जो कहा गया, बताया गया उसे दिल लगाकर पूरी मेहनत से करने वाले। ऐसे नेता कम होते हैं। जो अपनी अक्ल बिल्कुल नहीं लगाते। भाजपा में दूसरे ऐसे ही मेहनती नेता शिवराज सिंह चौहान हैं। चौबीस घंटे, सातों दिन काम करने वाले। यह सामान्य मानवीय स्वभाव नहीं है। उससे आगे जाकर करने का है। इसके अच्छे, बुरे दोनों परिणाम होते हैं। संगठन के लिए अच्छे मगर व्यक्ति के लिए इन अर्थों में बुरे कि उसकी क्षमता, उपयोगिता का आकलन दूसरे लोग करते हैं और जब उन्हें उसमें जरा भी कमी होती नजर आती है तो उनके लिए कर्मयोगी ही बने व्यक्ति को दूर करने की कोशिशें शुरु हो जाती हैं।


संघ में योगी को नए ऐसेट (संपत्ति) की तरह देखा जा रहा है। उनकी उम्र अभी कम है। पचास के हैं। छवि मोदी की तरह हिन्दू नेता की है। मोदी 72 के होने वाले हैं। अभी नहीं तो कुछ समय उनका विकल्प संघ को खोजना होगा। 2004 में वाजपेयी का नहीं खोज पाए थे तो कांग्रेस ने पूर्ण बहुमत पाए बिना दस साल शासन कर लिया। संघ इस बार शायद यह गलती न करे।
भारत में पार्टियां भाजपा और कांग्रेस बड़ी हैं। मगर राजनीति आज भी व्यक्तिवादी होती है। जनता व्यक्ति को देखती है। मोदी की तत्परता उसे अच्छी लगती है। राहुल का असमंजस उसे निराश करता है। इसलिए ऐसे समय में जब भारत की छवि दांव पर लगी है मोदी का मौन रहस्यात्मक लगता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

Leave a Reply

Your email address will not be published.