हाजी रफ़अत अली ख़ान: सूफीवाद की शमा बुझ गई

ख़ालिद अय्यूब मिस्बाही

अल्लामा इकबाल का एक बड़ा मशहूर शेर है-

हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है

बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा

आज के दौर में यह शेर जयपुर के महान समाजसेवी हाजी रफ़अत अली खान पर सटीक बैठता है। करीब 65 वर्षीय हाजी रफ़अत अली खान का 31 मई 2021 को दिल का दौरा पड़ने से जयपुर में निधन हो गया। हाजी साहब का यूँ चले जाने से भारत में सूफीवाद का बड़ा नुक़सान हुआ है। वह शांति के प्रवर्तक थे और एक समर्पित सूफ़ी होने के नाते जयपुर शहर में उन्हें ‘अम्न का मसीहा’ कहा जाता था। राजधानी में सरकार और प्रशासन का शायद ही कोई ऐसा काम हो जिसमें हाजी रफ़अत साहब को ना याद किया जाता हो। खासतौर से प्रदेश में जब भी सांप्रदायिक तनाव की स्थिति बनी, हाजी रफ़अत साहब ने इसे कम करने और समाज में सौहार्द को स्थापित करने में बड़ा योगदान दिया।

सन् 1992 में बाबरी मस्जिद के शहीद होने से लेकर पिछले साल कांवड़ यात्रा के दौरान बकरीद के दिन उत्पन्न सांप्रदायिक तनाव की स्थिति तक, जयपुर में हाजी रफ़अत साहब ने कभी शहर को बेसहारा नहीं छोड़ा और शांति क़ायम करके ही दम लिया। एक कामयाब व्यापारी होने के बावजूद उनके दिल में हमेशा एक फकीर बसता था। मेरा निजी अनुभव है कि एक बच्चे को किसी बात पर रुलाना मुश्किल हो सकता है लेकिन प्रेम, सद्भाव और सूफीवाद की एक पंक्ति बोलकर हाजी रफ़अत साहब को फूट फूट कर रुलाया जा सकता था। वह इतने नरम दिल के मालिक थे कि आंसू उनकी पलकों पर रहते थे। उन्होंने अपने शहर को बच्चे की तरह प्यार किया।

शायद ही किसी गैर राजनीतिक समाजसेवी की ऐसी छवि हो कि जिन्हें देखकर मुख्यमंत्री से लेकर पुलिस और प्रशासन के आला अफसर, मंत्री संतरी और एक आम इंसान भी सम्मान में खड़ा हो जाता था। यह उनका रौब नहीं बल्कि सम्मान का प्रतिमान था जिसका उन्होंने कभी दुरुपयोग नहीं किया।

साल भर के कैलेंडर आधारित कार्यक्रम तो समाज सेवा को रफ़अत साहब समर्पित किए रहते ही थे इसके अलावा जब-जब प्रदेश की जनता को जरूरत पड़ती, वह हमेशा उनकी खिदमत में हाजिर होते।

पिछले साल जब कोरोना ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया तो जाहिर है जयपुर में भी इसके दुष्प्रभाव देखने में आए, लेकिन जिस समाज का खिवैया हाजी रफ़अत अली खान जैसी शख्सियत हो उन्हें क्या परेशानी हो सकती है। हाजी रफ़अत अली खान साहब ने इस परिस्थिति को फौरन समझते हुए एक लोकल सामाजिक ब्रांडा ‘संजरी’ को लांच किया और गरीबों के घर राशन पहुंचाने का जिम्मा उठाया।

हजारों परिवारों को करोड़ों रुपए के राशन की उन्होंने सप्लाई की और लोगों को उन्होंने इस राशन में सहयोग देने के लिए अपील की। समाज में उनकी प्रतिष्ठा ऐसी थी कि कोई उनकी बात से इनकार नहीं कर सकता था और देखते ही देखते जयपुर शहर में न सिर्फ मुसलमान बल्कि हर वर्ग के लोगों को यह उम्मीद बन गई कि वह कम से कम भूख से नहीं मारेंगे क्योंकि हाजी रफ़अत अली खान साहब और उनकी टीम ‘संजरी’ राशन के साथ उनको बचाने के लिए तत्पर है।

कदाचित कोरोना के दौरान घरों पर राशन बाँटने की योजना लाने वाले हाजी रफ़अत साहब पहले व्यक्ति थे। घरों में बंद लोगों की जरूरत को समझते हुए उन्हें घर तक राशन पहुंचाने का आईडिया रफ़अत साहब ने विकसित किया। यह रफ़अत अली खान साहब की दूरअंदेशी थी और देखते ही देखते यह आइडिया पूरे देश में मशहूर हो गया और लोगों के बीच राशन पहुंचाने की एक होड़ लग गई। परंतु इस आइडिया के जनक हाजी रफ़अत अली खान साहब ने कभी भी इस बात का क्रेडिट लेने की कोशिश नहीं की कि एक छोटा सा आइडिया समाज को भुखमरी से बचा सकता है।

जयपुर शहर में भारत का तीसरा सबसे बड़ा ईद मिलादुन्नबी का जुलूस निकलता है। इस जुलूस में आज से 30 साल पहले कुछ सौ लोग भी जमा नहीं होते थे, लेकिन एक सूफ़ी होने के नाते इस्लाम के पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के प्रति अगाध श्रद्धा को दिखाते हुए हाजी रफ़अत अली खान साहब ने लोगों को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वह जुलूस ए ईद मिलादुन्नबी में शरीक होकर अपनी आस्था का प्रकटीकरण करें।

वहीद मेमोरियल ट्रस्ट के बैनर पर उन्होंने यह काम शुरू किया और देखते ही देखते ईद मिलादुन्नबी का जुलूस लाखों लोगों के एक रेले में बदल गया, जिसे भारत के इतिहास में तीसरा सबसे बड़ा सालाना ईद मिलादुन्नबी जुलूस के तौर पर शुमार किया जाता है।

हाजी रफ़अत अली खान नौजवानों के लिए और बच्चों के लिए विशेष रूप से काफी परेशान रहते थे। इसके लिए उन्होंने त्रिस्तरीय योजना पर कार्य किया। सबसे पहले उन्होंने स्कूली शिक्षा पर जोर दिया और कामयाबी के साथ 12वीं कक्षा तक की हिरा पब्लिक स्कूल की स्थापना की, जो आज कामयाबी के साथ हजारों बच्चों को पढ़ा रही है। स्कूल के बराबर में वह अहले सुन्नत मदरसा भी चलाते थे जिसमें हर साल बच्चे इस्लामी धार्मिक शिक्षा और कुरान को हिफ़्ज़ करने की तालीम ले रहे हैं।

महिला शिक्षा के प्रति उन्होंने बहुत गंभीरता दिखाई और उनके समाज सेवा के काल के दौरान जयपुर शहर में महिलाओं की शिक्षा का स्तर बहुत बेहतर हुआ। लड़कियों की स्कूल ड्रॉपआउट रेट भी तेजी के साथ घट गई। वह इस्लाम की उस उक्ति विश्वास करते थे कि यदि आप ने महिला को पढ़ाया तो दो ख़ानदानों को पढ़ाया।

नौजवानों के लिए नशा मुक्ति को लेकर काफी गंभीर थे और नौजवानों को नशा छुड़वाने के लिए वह पुलिस और प्रशासन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने कई सभाओं और कार्यक्रमों का आयोजन किया और पुलिस प्रशासन के सहयोग से वे कई नौजवानों को नशा छुड़वा कर समाज की मुख्यधारा में लाने में सफल रहे। कहा जा सकता है कि नशे की गिरफ्त से छुड़वाने के लिए प्रयासों से ज्यादा असर हाजी रफ़अत साहब की बोली का रहता है। देखने वाले कहते थे कि उन्हें कभी किसी पर गुस्सा करते हुए नहीं देखा गया। वह एक मुस्कुराता हुआ सूफ़ी फकीर का चेहरा था जिससे खुदा की नुसरत हासिल थी।

हाजी साहब ख़ुद को ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह के ग़ुलामों में खुद को गिनते थे। हाजी साहब ने जयपुर में सूफीवाद की मद्धम हो रही शमा को फिर से रोशन किया। अपने निजी खर्च से उन्होंने हजरत जियाउद्दीन रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह का जीर्णोद्धार करवाया। इसके अलावा जयपुर में विभिन्न सूफी संतों के मजारों की स्थिति को सुधारने के लिए उन्होंने जन सहयोग के साथ अपने निजी जेब से लाखों रुपए खर्च किए और दरगाहों को उनके सम्मान के साथ स्थापत्य से जोड़ा। रफ़अत साहब मानते थे कि दरगाहों का जीर्णोद्धार नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ी यह भी भूल जाएगी कि किस मजार के नीचे सोने वाला फकीर कितना महान रहा होगा।

प्रशासन की तरफ से कोई भी ऐसी योजना नहीं होती होगी जिसमें समाजसेवी हाजी रफ़अत अली खान साहब को याद ना किया जाता हो। चाहे नारी शक्ति हो, महिलाओं के विरुद्ध अपराध रोकने की मुहिम हो, सफाई, मेडिकल कैंप, रक्तदान, गरीबी उन्मूलन समेत ऐसी कोई पहल नहीं होती थी जिसमें हाजी रफ़अत साहब को ना याद किया जाता रहा। यह उनकी सदाशयता का सबसे बड़ा प्रमाण है कि वह अपने वादे के पक्के थे। इसलिए एक सूफी फकीर के नाते वह जो वादा करते थे उसे निभाने का पूरा पूरा प्रयास करते थे।

आज जबकि शिक्षा और सामाजिक उत्थान की समाज सेवा में मैं भी आ गया हूं, मुझे ऐसा लगता है कि मैंने अपना रहनुमा खो दिया। हम किससे पूछ कर अब समस्याओं से लड़ना सीखेंगे, इसका उत्तर मैं भी ढूंढ नहीं पाया हूं। मुझे विश्वास है कि ख़ुदा उनकी बख़शिश फरमाएगा। उनकी बरकत से रफ़अत साहब के शुरू किए गए कार्यों को हमारे हाथों से जिंदा रखेगा। इंशाल्लाह।

(लेखक इदारा ए क़ुऱआन के संस्थापक और तहरीक उलामा ए हिन्द के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)