बीजेपी के ‘MY’ के आगे बेअसर हो गया जाट, यादव और मुस्लिम समीकरण

एक वक्त था जब ‘माय’ समीकरण उत्तर प्रदेश की राजनीति की दशा और दिशा तय करता है. इस समीकरण के बदौलत पहले मुलायम सिंह यादव और फिर अखिलेश यादव सूबे की सियासत के शिखर पर पहुंचे. तो वहीं पश्चिमी यूपी में जाट-मुस्लिम कॉम्बिनेशन भी निर्णायक माने जाते थे. लेकिन बीजेपी के उभार ने सभी समीकरण और सियासी प्रयोग को फेल कर दिया है. बीजेपी की रणनीति के आगे न कोई रणनीति काम आ रही है और ही जातीय समीकरण कोई कारनामा दिखा पा रहा है.

कोरोना काल में मची तबाही और किसान आंदोलन की वजह से माना जा रहा था कि यूपी में इस बार बीजेपी को भारी नुकसान होने वाला है. कुछ लोगों का तो ये भी मानना था कि राज्य में बीजेपी की सरकार नहीं बन पाएगी. लेकिन बीजेपी की बड़ी जीत ने सबको खामोश कर दिया. बीजेपी ने जिस तरह से गैर-यादव ओबीसी की राजनीति को जमीन पर उतारकर सपा के खिलाफ ऐसा सियासी एजेंडा सेट किया, जिससे कुर्मी, कुशवाहा, लोध, पाल जैसी जातियां एकजुट होकर बीजेपी के साथ खड़ी हो गईं.

आरएलडी के नेता जयंत चौधरी को लग रहा था कि इस बार के चुनाव में उनकी पार्टी अच्छा प्रदर्शन करेगी लेकिन चुनाव के नतीजों ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया. सपा से गठबंधन के बावजूद आरएलडी को महज आठ सीटों पर ही जीत मिली है. जाट बेल्ट में बीजेपी गुर्जर, कश्यप, सैनी, ठाकुर, वाल्मिकी, शर्मा, त्यागी जैसी जातियों के समीकरण बिठाने में कामयाब रही. ये तमाम जातियों की गोलबंदी जाट बेल्ट में बीजेपी की जीत का आधार बनीं. इस तरह बीजेपी ने जाट बेल्ट में जाट-मुस्लिम समीकरण को ध्वस्त कर दिया.

दरअसल, बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में नई सियासी राजनीति खड़ी की है, जिसमें धार्मिक और जातीय समीकरण ध्वस्त हो गए हैं. मोदी-योगी की डबल-इंजन सरकारों द्वारा लाई गई योजनाएं थीं, जिनकी वजह से बीजेपी के पक्ष में जमकर वोटिंग हुई. इसके अलावा महिला वोटरों के बीच भी बीजेपी ने अपना आधार मजबूत किया है. इसके अलावा तमाम पिछड़ी जातियों के मतदाताओं तक अपनी पकड़ मजबूत की, जो जीत का फार्मूला बना और यादव, मुस्लिम, जाट जैसी प्रभुत्व वाली जातियां सियासी तौर पर धरी की धरी रह गईं.

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